Thursday, May 26, 2016

Loneliness and aloneness

I spend long periods of time each day by myself with my dogs and the television's babble for company. One would think that being alone so much might be tough but I really value time in my own company. I think the past two years have taught me more about myself than all the years that came before combined. I have found a peace within myself, and comfort in silence.

While I thoroughly enjoy time with my friends, I always spend a few hours just reading, or having tea and looking fondly at the Neem tree outside my window gently undulating in the breeze. The summer can be cruel in the desert but the truth is that it makes life bright. The sun breaks through the curtains and fills my home with light.

I have understood the essential difference between being lonely and simply being alone. When you are lonely, you long for human contact, to say something to someone but when you are comfortable with who you are you don't always crave proximity with other people. You value being alone and being able to do things that bring you joy. There is joy in the most mundane of things. When I clean my home, do the dishes, wash the laundry I try to do it as well as I can. To me it's important that everything I do is done as well as possible. It's true, I actually like doing these things. It's very satisfying when everything is done and I can sit on my laptop and work in peace.

So what I'm trying to say is that learn to enjoy your own company more. Do everything as well as you can, even if it's washing a cup. 

3 comments:

Shiv Shanker said...

1968 मे मेरी यूपी सेल्स टैक्स मे नौकरी लगी और पहली पोस्टिंग गाजियाबाद हुई और मैं रामनगर में एक कमरा किराये पर लेकर रहता था । वो मकान मालिक ने किराये पर उठाने के डिजाईन से ही बनवाया था । आमने सामने लाईन में कमरे थे नीचे और ऊपर की मंजिल पर । कई तरह के लोग रहते थे । एक कमरे मे दो फौजी रहते थे । कुछ मे फैक्ट्री वर्कर्स रहते थे । मेरे कमरे के बगल में एक दम्पति रहती थी । मर्द शर्मीला था और औरत थोड़ी कड़क और खूबसूरत थी । मुफलिसी ने हालांकि कड़क दबा दी थी पर फिर भी वो कुछ रमक बनाये थी । मेरी नौकरी क्योंकि सरकारी थी तो मुफलिसी नहीं थी । मर्द जो शर्मीला था वास्तव में बम्बई कई साल फिल्नों में स्ट्रगल कर आया था । उसने कुछ फिल्मों मे छोटे मोटे रोल भी किये थे । मुझे तो बचपन से ही फिल्नों का बड़ा शौक रहा है तो मै उसे एक अलग ही ढंग से देखता था और उसकी इज्जत करता था । वो भी मेरे व्यवहार को समझता था और मुझे उसने फिल्मी संसार के अपने कई अनुभव भी सुनाये । वो शशि कपूर से दोस्ती का दावा भी करता था और उसने बताया कैसे शहर मे एक बार शशि कपूर उसे ढूंढता फिरता रहा । उसने शशि कपूर की माय लव फिल्म में काम किया था । उसने माला सिन्हा की आसरा फिल्म में भी काम किया था । उन दिनों राज गाजियाबाद के सिनेमा मोहन चित्रलोक ने में गेटकीपर का काम कर रहा था । कुदरत का खेल देखिये कि मोहन चित्रलोक में उन दिनों फिल्म आसरा लगी (रिपीट में.. तब फिल्में बार बार लगा करती थीं ) । अन्दर उसकी फिल्म चल रही होती और बाहर वो गेट कीपिंग करता । आप यदि ये फिल्म देखें तो जब माला सिन्हा बेहोश हो जाती है तब राज ट्रे में पानी लेकर आता है । वो ही मेरा पड़ोसी था । राज बड़ा मीठा और सलीके से बोलता था । वो मुझे बड़े अदब से 'कलाकार' कहकर बुलाता था। किसी तरह से उन्होंने अपनी मुफलिसी पर परदा डाला हुआ था । उनकी एक आठ दस साल की बच्ची भी थी । जब कभी चाय के लिये दूध नही होता या,चीनी चाहिये होती तो राज बड़े प्यार से आवाज लगाता कलाकार थोड़ा दूथ होगा या थोड़ी चीनी होगी । मुझे कभी बुरा नहीं लगा और मैने कभी मना नहीं किया । मुझे ये भी पता था कि राज को उसकी बीवी ने भेजा होता था । वो शर्मीला था और शायद मांगने मे उसे शर्म भी आती थी पर वो कलाकार सम्बोधन के नीचे उसे छिपा लेता था । मै उसके कमरे में शायद ही कभी गया हूँ । मेरी कभी भी उस की बीवी से बात नहीं होती थी । मेरा उनसे जो भी सम्पर्क था वो राज के माध्यम से ही था । आज 45 साल हो गये इस बात को पता नहीं राज किस हाल में होगा और उसके बीवी बच्चे किस हाल में हैं । हैं भी या नहीं ।

Parul Gahlot said...

Kitna interesting wakya hai, Papa!

anshuman kishore said...

Ispe kahani likhi ja sakti hai....